My Dominant Hemisphere

The Official Weblog of 'The Basilic Insula'

Archive for the ‘History & Culture’ Category

कैसे हमारी भाषाएँ हमारी विचारधारा को शकल देती हैं | کیسے ہماری زبانیں ہماری سوچ و فکر کو شکل دیتی ہیں

with one comment

Group of early 20th century Ceylon Moors (via Wikipedia)


नमस्कार दोस्तो !

जैसा कि आप जान गए होंगे ये हिन्दी में मेरा पहला ब्लॉग पोस्ट है। मैं ये कोशिश कर रहा हूँ कि जितनी भी भाषाएँ मुझे आती हैं, इन सब का इस ब्लॉग पर इस्तेमाल किया करूँ।

कई दिन पहले मैं एक बढ़िया लैक्चर देख रहा था। जिसका विषय था Urdu Politics In Hyderabad State” अर्थात “उर्दू भाषा की राजनीति, हैदराबाद राज्य में। हैदराबाद राज्य से मतलब, उस वक़्त का जब वो निज़ाम सरकार द्वारा (लेकिन अंग्रेज़ो की निगरानी में) चलाया जाने वाला अलग मुल्क था।  निवेदन-कर्ता थीं कविता दतला और वो बता रही थीं कि किस तरह एक ज़माना हुआ करता था जब हिन्दी और उर्दू एक ही बोली हैं माने जाते थे। एक ऐसा ज़माना, जब ये समझा जाता था कि ये दोनों में फर्क केवल लिखने में ही है। किस तरह, जो लोग उर्दू जानते थे वो हिन्दी भी लिखना-पढ़ना समझते थे और उसी प्रकार जो लोग हिन्दी बोलते थे, वो उर्दू के भी माहिर थे। और कैसे जब अंग्रेजों ने दक्षिण एशिया के इस अनोखे उपमहाद्वीप पर कदम रखा, तो उनकी भी यही गणना थी, जो हम उस ज़माने की अंग्रेज़ी पुस्तकों में पा सकते हैं। कलकत्ता के “Royal Asiatic Society Of Calcutta” की पुस्तकालय में ऐसी कई पुस्तकें भरी पड़ी हैं। उर्दू और हिन्दी ऐसी जुड़ी हुई हैं, कि एक की परिपक्वता दूसरे की उन्नति पर निर्भर है।

आगे भाषण में ये भी सवाल आया, कि आख़िर ये दोनों भाषाएँ अपने इस अटूट और सुंदर रिश्ते से कब और कैसे मुंह मोड़ने लगीं? हाँ ये सच है कि आज भी चंद लोग होंगे जो इन दोनों के बीच ज़्यादा भेद-भाव नहीं करते और दोनों को उतना ही अपने व्यष्टित्व से जोड़ते हैं जो बड़ी ही उच्चपद वाली बात है। लेकिन आज अधिकतर लोग समझते हैं कि इन दोनों के बीच धार्मिक स्वभाव का अंतर है। और ऐसा जब कि इन दोनों के बीच धार्मिक अंतर पहले होता ही नहीं था। श्रीमति दतला इस इतिहास को खोजती हैं। कैसे भाषा से हम अपनी पहचान बनाते हैं, और किस प्रकार ये पहचान समय के साथ-साथ राजनैतिक कारणों से बदलती रहती है। और वो भी आम आदमी के बोध के बग़ैर।

भाषण में, विज्ञान की दुनिया में उर्दू को बढ़ोतरी देने वाली विश्वविद्यालयों और उन से जुड़े माननीय विधवानों के इतिहास पर, उर्दू तथा हिन्दी के बदलते रिश्तों और इन के द्वारा समाजी मनोवैज्ञानिकता पर असर, इन सब पर भी बहुत दिलचस्प बातें हुईं। कैसे लोगों के बीच फूट की कृत्रिम जड़ें पैदा हुईं, और इन के अंशतः कारण कैसे एक भव्य उपमहाद्वीप के लोगों को ऐसे लहू-लुहान बटवारे को सहना पड़ा, जो मानवीय इतिहास के सब से बड़े खून-खराबों में शामिल होता है।

मुझे इस लैक्चर की सब से दिलचस्प बात ये लगी, कि ये भाषा और उस के समाजी मनोवैज्ञानिकता तथा आत्मिक स्वभाव पर प्रभाव के ऊपर एक महत्वपूर्ण उपदेश देता है। एक ऐसा सबक जो सिखाता है मनुष्य के छोटेपन और उस के द्वारा उस के अंदर ऐसी मूर्खपूर्ण एवं भयानक संभावना को, जो कर सकती है मानव जाति को अपने ही हाथों नष्ट।

मेंने इस से पहले computer programming पर लिखा था। लेकिन आज के विषय से संबन्धित एक विचार तब सामने नहीं लाया था हालांकि वहाँ पर भी भाषा एवं मानसिक स्वभाव के तालमेल का भरपूर उदाहरण देखने को मिलता है। शायद अंदर ही अंदर ये सोचा था कि इस बारे में अगर अलग ही ब्लॉग पोस्ट हो तो बेहतर होगा। दरअसल जो व्यक्ति Python जैसी भाषा में programming करता है, उस की सोच और विचारधारा एक C भाषा में programming करने वाले से भिन्न होती है। मानो कि विचारधारा कि सीमाएं भाषा से बिलकुल जुड़ी होती हैं। जो व्यक्ति machine language में सोचता है, उसी को computer के अंदरूनी हिसाब-किताब का असली मानों में पता होता है, क्यूंकि वो computer जैसा सोचने लगता है। हमारी सोच किस कदम पर चलती है और कैसा रूप ढा लेती  है, ये ईस पर काफी कुछ निर्भर होता है कि हम किस भाषा में अपनी विचारधाराओं को सँवारते हैं।

उर्दू इतिहास से संबन्धित मेंने एक और बेहतरीन लैक्चर देखा, जो शहर दिल्ली के अनेक मान्यवर उर्दू विद्वानों के अन्योन्यदर्शनों से भरपूर है। लेखकों के साथ ये बातचीत, Delhi’s Mother Tongue: The Story Of Urdu” अर्थात “दिल्ली की मात्र-भाषा: उर्दू की कहानी, के नाम से उपलब्ध है। निर्देशक हैं, श्रीमान वरुण। इस भाषा के इतिहास का वर्णन करते हुए विद्वान ये कहते हैं, कि हिन्दी और उर्दू ऐतिहासिक रूप से एक ही बोल-चाल के ढंग हैं। उन का मानना है कि समय की लकीर पर उर्दू का जन्म हिन्दी से पहले हुआ, उस वक़्त जब सुल्तान बादशाहों का इस क्षेत्र की ओर आना हुआ। सुल्तानों की सेना को लोक भाषा, जो उस जमाने में ब्रज-भाषा थी, समझ नहीं आती थी। और वो चाहते थे (शायद सैन्य श्रेष्ठता के लिए) कि जनता के साथ ताल्लुक़ात पैदा करने के लिए एक ऐसी भाषा को जन्म दिया जाए जो खुद अपनी तुर्कीय भाषा के साथ साथ लोक-भाषा के मिलाव से एक अनोखा मिश्रण हो। और इस प्रकार उर्दू भाषा दुनिया में पहली बार आई। आरंभ में तो इस भाषा का ज़ोर बोल-चाल में आसानी पैदा करने पर ही था, और लिखाई-पढ़ाई बाद में आई। जब लिखाई-पढ़ाई आई, तब जा कर लोगों ने लिपि के अनेक रूप अपनाए जिन में से दो लिपियाँ वो हैं जिन को आजकल हम उर्दू लिपि और हिन्दी लिपि के नाम से पहचानते हैं। धीरे धीरे, दोनों भाषाओं की लोकप्रियता बढ़ते गयी, और एक भाषा की उन्नति से दूसरी भाषा पर भी प्रभाव पड़ता गया। हत्ता कि आज भी देखा जाए तो यही सिलसिला चलता जा रहा है!

लिपियों से एक और बात याद आई। क्या आप जानते हैं कि श्रीलंका में जो लोग “(Ceylon Moor)” “सीलोन मूर के नाम से अपनी पहचान बनाते हैं, उनहों ने एक जमाने में अरबी भाषा को अपनाया था? और मज़े की बात ये है कि बोल-चाल अरबी थी तो ज़रूर लेकिन लिपि होती थी तमिल में! यानि कि अरबी बोल को वो लोग तमिल लिपि में लिखा करते थे। समय के साथ साथ उन का अरबी से संबंध टूटता गया और वो अरबी को छोड़ कर पूरी तरह से तमिल बोली पर आ गए। है ना दिलचस्प बात!

आशा है कि आज का ये ब्लॉग पोस्ट आप सभी को अच्छा लगा होगा। आज के लिए इतना ही। मिलते हैं अगली बार!

————————————————————————————

کہانی اردو زبان کے پیدائش کی


(ایک ضروری بات: اس مضمون کو سہی روپ میں دیکھنے کے لئے آپ ناظرین کو یہ font ڈاونلوڈ کرکے اپنے سسٹم پر ڈالنا ہوگا . یہ ایسی font ہے جو خاص کمپیوٹر سکرین پر باآسانی پڑھنے کے لئے بنائی گئی ہے .)

آداب دوستو ،

جیسا کہ آپ جان گئے ہونگے یہ ہندی میں میرا پہلا بلوگ پوسٹ ہے . میں یہ کوشش کر رہا ہوں کی جتنی بھی زبانیں مجھے آتی ہیں ، ان سب کا اس بلوگ پر استعمال کیا کروں .

کئی دن پہلے میں ایک بڑھیا خطاب دیکھ رہا تھا . جس کا عنوان تھا Urdu Politics in Hyderabad State” یعنی کہ ” اردو زبان کی سیاست ، ریاست حیدراباد میں . ریاست حیدرآباد سے مطلب اس وقت کا جب وہ نظام کے زیر انتظام (لیکن انگریزوں کی نگرانی میں) الگ ملک ہوا کرتا تھا . خطیبہ تھیں محترمہ کویتا دتلا اور وہ بتا رہی تھیں کہ کس طرح ایک زمانہ ہوا کرتا تھا جب ہندی اور اردو ایک ہی بولی ہیں ، مانے جاتے تھے . ایک ایسا زمانہ ، جب یہ سمجھا جاتا تھا کہ یہ دونوں میں فرق صرف لکھنے میں ہی ہے . کس طرح ، جو لوگ اردو جانتے تھے وہ ہندی بھی لکھنا پڑھنا سمجھتے تھے اور اسی طرح جو لوگ ہندی بولتے تھے ، وہ اردو کے بھی ماہر تھے . اور کیسے جب انگریزوں نے جنوبی آسیہ کے اس انوکھے برصغیر پر قدم رکھا ، تو ان کا بھی یہی جائزہ تھا ، جو ہم اس زمانے کی انگریزی کتابوں میں پا سکتے ہیں . کلکتہ کے ” Royal Asiatic Society of Calcutta ” کے کتاب خانے میں ایسی کئی کتابیں بھری پڑی ہیں . اردو اور ہندی ایسی جڑی ہوئی ہیں کہ ایک کی برتری دوسرے کی ترقی پر منحصر ہے .

آگے خطاب میں یہ بھی سوال آیا ، کہ آخر یہ دونوں زبانیں اپنے اس اٹوٹ اور خوبصورت رشتے سے کب اور کیسے منہ موڑنے لگیں ؟ ہاں یہ سچ ہے کہ آج بھی چند لوگ ہونگے جو ان دونو کے بیچ زیادہ تفرق نہیں کرتے اور دونو کو اتنا ہی اپنی یکسانی سے جوڑتے ہیں ، جو بڑے اصالت والی بات ہے . لیکن آج بیشتر لوگ سمجھتے ہیں کہ ان دونوں کے بیچ مذہبی خصوصیات والا فرق ہے . اور ایسا جب کہ ان دونو کے درمیان مذہبی تفرق پہلے ہوتا ہی نہیں تھا . محترمہ دتلا اس تاریخ کو کھوجتی ہیں . کیسے زبان سے ہم اپنی پہچان بناتے ہیں ، اور کس طرح یہ پہچان وقت کے ساتھ ساتھ سیاسی اسباب سے بدلتی رہتی ہیں . اور وہ بھی عام آدمی کی آگاہی کے بغیر .

تقریر میں ، علمی دنیا میں اردو کو بڑھاوا دینے والی جامعیات اور ان سے جڑے نامور عالموں پر ، اردو اور ہندی کے بدلتے رشتوں اور ان کا اثر سماجی نفسیات ، ان سب پر بھی بہت دلچسپ باتیں ہوئیں . کیسے لوگوں کے بیچ پھوٹ کی مصنوعی جڑیں پیدا ہوئیں ، اور ان کے باعث (کچھ حد تک ہی سہی) کیسے ایک شاندار برصغیر کے لوگوں کو ایسے لہو-لہان بٹوارے کو سہنا پڑا ، جو انسانی تاریخ کے سب سے بڑے خون-خرابوں میں شامل ہوتا ہے .

مجھے اس تقریر کی سب سے دلچسپ بات یہ لگی ، کہ یہ زبان اور اس کے سماجی نفسیاتی حالات اور روح پر اثر کے اوپر ایک اہمترین سبق دیتا ہے . ایک ایسا سبق جو سکھاتا ہے آدمی کے چھوٹےپن اور اس کے ذریع اس کے اندر ایسی نکممی اور بھیانک قابلیت کو ، جو کر سکتی ہے آدم ذات کو اپنے ہی ہاتھوں تباہ .

میں نے اس سے پہلے computer programming پر لکھا تھا . لیکن آج کے موضوع سے متعلق ایک خیال تب سامنے نہیں لایا تھا ، حالانکہ وہاں پر بھی زبان اور نفسیاتی طبعیت کے تال میل کی بھرپور مثال دیکھنے کو ملتی ہے . شاید اندر ہی اندر یہ سوچا تھا کہ اس بارے میں اگر الگ ہی بلوگ پوسٹ ہو تو بہتر ہوگا . دراصل جو آدمی Python جیسی زبان میں programming کرتا ہے ، اس کی سوچ کا رخ و شکل ایک C زبان میں programming کرنے والے سے الگ ہوتا ہے . گویا کہ خیالات کے رخ کی سرحدیں ، زبان سے بلکل جڑی ہوتی ہیں . جو آدمی machine language میں سوچتا ہے ، اسی کو computer کے اندرونی حساب-کتاب کا اصلی معنوں میں پتا ہوتا ہے ، کیوں کہ وہ computer جیسا سوچنے لگتا ہے . ہماری سوچ کس قدم پر چلتی ہے اور کیسا روپ ڈھا لیتی ہے ، یہ اس پر کافی کچھ منحصر ہوتا ہے کہ ہم کس زبان میں اپنے خیالات کو سنوارتے ہیں .

اردو تاریخ سے متعلق میں نے ایک اور بہترین تقریر دیکھی ، جو شہر دلّی کے مختلف نامور اردو ادبیات کے ماہرین کے انٹرویو سے بھرپور ہے . ماہرین کے ساتھ یہ گفتگو ، Delhi’s Mother Tongue: The Story of Urdu” یعنی کہ ” دلّی کی مادری زبان : اردو کی کہانی ، کے نام سے ملے گی . منتظم ہیں جناب ورن . اس زبان کی تاریخ کی وضاحت کرتے ہوے ماہرین یہ کہتے ہیں ، کہ ہندی اور اردو تاریخی روپ سے ایک ہی بول-چال کے ڈھنگ ہیں . ان کا ماننا ہے کہ وقت کی لکیر پر اردو کی پیدائش ہندی سے پہلے ہوئی ، اس وقت جب سلطان بادشاہوں کا اس خطّے کی طرف آنا ہوا . سلطانوں کی فوج کو عوام کی زبان ، جو اس زمانے میں برج-بھاشا تھی ، سمجھ نہیں آتی تھی . اور وہ چاہتے تھے (شاید دفاعی حکمت عملی کے لئے) کہ عوام کے ساتھ تعلّقات پیدا کرنے کے لئے ایک ایسی زبان کو ایجاد کیا جاۓ جو خود اپنی ترکی زبان کے ساتھ ساتھ عام بولی کے ملاؤ سے ایک انوکھا مرکب ہو . اور اس طرح اردو زبان دنیا میں پہلی بار آئی . شروعات میں تو اس زبان کا زور بول-چال میں آسانی پیدا کرنے پر ہی تھا ، اور لکھائی-پڑھائی بعد میں آئی . جب لکھائی-پڑھائی آئی ، تب جا کر لوگوں نے دستاویز و خط کے مختلف روپ اپناۓ جن میں سے دو دستاویز وہ ہیں جن کو ہم آج کل اردو خط اور ہندی خط کے نام سے پہچانتے ہیں . دھیرے دھیرے ، دونوں زبانوں کی مقبولیت بڈتے گئی ، اور ایک زبان کی ترقی سے دوسری زبان پر بھی اثر پڑتا گیا . حتیٰ کہ آج بھی دیکھا جاۓ تو یہی سلسلہ چلتا جا رہا ہے !

دستاویزوں سے ایک اور بات یاد آئی . کیا آپ جانتے ہیں کہ سریلنکا میں جو لوگ “(Ceylon Moor)” “سیلون مور کے نام سے اپنی پہچان بناتے ہیں ، انہوں نے ایک زمانے میں عربی زبان کو اختیار کیا تھا ؟ اور مزے کی بات یہ ہے کہ بول چال تو عربی تھی تو ضرور لیکن خط و دستاویز تھا تامل میں ! یعنی کہ عربی بول کو وہ لوگ تامل دستاویز میں لکھا کرتے تھے . وقت کے ساتھ ساتھ ان کا عربی سے رابطہ ٹوٹتا گیا اور وہ عربی کو چھوڈ کر پوری طرح سے تامل بولی پر آ گئے .  ہے نہ دلچسپ بات !

امید ہے کہ آج کا یہ بلوگ پوسٹ آپ سبھی کو اچّھا لگا ہوگا . آج کے لئے اتنا ہی . ملتے ہیں اگلی بار !


Copyright Firas MR. All Rights Reserved.

“A mote of dust, suspended in a sunbeam.”


Search Blog For Tags: , , , , , , , ,

Written by Firas MR

November 9, 2010 at 11:39 pm

Let’s Face It, We Are Numskulls At Math!

with one comment

Noted mathematician, Timothy Gowers, talks about the importance of math

I’ve often written about Mathematics before Footnotes. As much as math helps us better understand our world (Modern Medicine’s recent strides have a lot to do with applied math for example), it also tells us how severely limited man’s common thinking is.

Humans and yes some animals too, are born with or soon develop an innate ability for understanding numbers. Yet, just like animals, our proficiency with numbers seems to stop short of the stuff that goes beyond our immediate activities of daily living (ADL) and survival. Because we are a higher form of being (or allegedly so, depending on your point of view), our ADLs are a lot more sophisticated than say those of, canaries or hamsters. And consequently you can expect to see a little more refined arithmetic being used by us. But fundamentally, we share this important trait – of being able to work with numbers from an early stage. A man who has a family with kids knows almost by instinct that if he has two kids to look after, that would mean breakfast, lunch and dinner times 2 in terms of putting food on the table. He would have to buy two sets of clothes for his kids. A kid soon learns that he has two parents. And so on. It’s almost natural. And when someone can’t figure out their way doing simple counting or arithmetic, we know that something might be wrong. In Medicine, we have a term for this. It’s called acalculia and often indicates the presence of a neuropsychiatric disorder.

It’s easy for ‘normal’ people to do 2 + 2 in their heads. Two oranges AND two oranges make a TOTAL of four oranges. This basic stuff helps us get by day-to-day. But how many people can wrap their heads around 1 divided by 0? If you went to school, yea sure your teachers must have hammered the answer into you: infinity. But how do you visualize it? Yes, I know it’s possible. But it takes unusual work. I think you can see my point, even with this simple example. We haven’t even begun to speak about probability, wave functions, symmetries, infinite kinds of infinities, multiple-space-dimensions, time’s arrow, quantum mechanics, the Higgs field or any of that stuff yet!

As a species, it is so obvious that we aren’t at all good at math. It’s almost as if we construct our views of the universe through this tunneled vision that helps us in our day-to-day tasks, but fails otherwise.

We tend to think of using math as an ability when really it should be thought of as a sensory organ. Something that is as vital to understanding our surroundings as our eyes, ears, noses, tongues and skins. And despite lacking this sense, we tend to go about living as though we somehow understand everything. That we are aware of what it is to be aware of. This can often lead to trouble down the road. I’ve talked about numerous PhDs having failed at the Monty Hall Paradox before. But a recent talk I watched, touched upon something with serious consequences that meant people being wrongfully convicted because of a stunted interpretation of DNA, fingerprint evidence, etc. by none other than “expert” witnesses. In other words, serious life and death issues. So much for our expertise as a species, eh?!

How the human mind struggles with math!

We recently also learned that the hullabaloo over H1N1 pandemic influenza had a lot do with our naive understanding of math, the pitfalls of corporate-driven public-interest research notwithstanding.

Anyhow, one of my main feelings is that honing one’s math not only helps us survive better, but it can also teach us about our place in the universe. Because we can then begin to fully use it as a sensory organ in its own right. Which is why a lot of pure scientists have argued that doing math for math’s own sake can not only be great fun (if done the right way, of course :-P) but should also be considered necessary. Due to the fact that such research has the potential to reveal entirely new vistas that can enchant us and surprise us at the same time (take Cantor’s work on infinity for example). For in the end, discovery, really, is far more enthralling than invention.

UPDATE 1: Check out the Khan Academy for a virtually A-Z education on math — and all of it for free! This is especially a great resource for those of us who can’t even recall principles of addition, subtraction, etc. let alone calculus or any of the more advanced stuff.

Copyright © Firas MR. All rights reserved.


# Footnotes:

  1. ذرا غور فرمائیے اپنے انسان ہونے کی حیثیت پر
  2. Decision Tree Questions In Genetics And The USMLE
  3. The Story Of Sine
  4. On The Impact Of Thinking Visually
  5. A Brief Tour Of The Field Of Bioinformatics
  6. Know Thy Numbers!

, , , , ,

ذرا غور فرمائیے اپنے انسان ہونے کی حیثیت پر

with 2 comments

واقعی کتنا چھوٹا ہے انسان

(ایک ضروری بات: اس مضمون کو سہی روپ میں دیکھنے کے لئے آپ ناظرین کو یہ font ڈاونلوڈ کرکے اپنے سسٹم پر ڈالنا ہوگا . یہ ایسی font ہے جو خاص کمپیوٹر سکرین پر باآسانی پڑھنے کے لئے بنائی گئی ہے .)

آداب دوستو ،

پچھلے کچھ لمحوں میں میرے ذہن میں ایک بات آئی . ہم انسان ‘ اشرف المخلوقات ‘ کے نام سے اپنے آپ کے بارے میں سوچتے ہیں ، اور یقیناً مذہبی طور پر بھی ہم کو یہی سکھایا جاتا ہے . اکثر اس بات کو لے کر ہم کافی مغرور بھی ہو جاتے ہیں . بھول جاتے ہیں کہ ، یے خطاب ہم پر یوں ہی نہیں نوازا گیا . کیا ہم اسکے واقعی حقدار ہیں ؟

سچ پوچھیں تو ہم اسکے حقدار تبھی کہلایںگے جب ہماری فکر اور ہمارے اعمال میں واضح طور پر اسکا ثبوت ہو . لیکن مجھے لگتا ہے کہ ہم میں سے اکثریت کا یہ حال ہے کہ نا تو ہم کو اس کا احساس ہوتا ہے اور نا اس بات کو لے کر دلچسپی . ہم اپنی روز مرّہ زندگیوں کو جینے میں اتنے گم و مبتلا ہیں کہ ‘ اشرف المخلوقات ‘ کا کردار نبھانا بھول جاتے ہیں . اور ایسی چیزوں پر توجہ دینا بھول جاتے ہیں جن پر وقت لگا کر ہم یے کردار نبھانے کی کم از کم کوشش تو کر سکتے ہیں .

کل میں نے جول سارٹور نام کے مشہور فوٹوگرافر کی تقریر دیکھی . اس میں وہ یے بیان کر رہے تھے کہ ہماری یے قدرتی ماحول کو تباہ کرنے کی رفتار کی تیزی ، ہماری اس رفتار کی تیزی سے کئی گنا بڑھ کر ہے جس سے ہم جیتے جاگتے جانور ، پیڑ – پودوں کے نئے اقسام کے بارے میں معلومات حاصل کرتے ہیں . آخر کتنی حیرت انگیز بات ہے یے . نا جانے کتنے ایسے قدرتی چیزوں کو دیکھے بغیر اور ان کے بارے میں غور کئے بغیر انسان یوں ہی آخر تک جیتا جا ے گا . وہ یے بھی بتا رہے تھے کہ اگلے دس سال میں دنیا کے تمام جل تھلیوں کے اقسام میں ، پچاس فیصد کا ناپیدا و غیب ہونے کا امکان ہے . یہ کوئی معمولی بات نہیں ہے !

طبّی دنیا میں بھی ہم نے حال ہی میں genetic codes کو سمجھنا شروع کیا ہے . اور ہماری بیماریوں کو لے کر جانکاری میں نئی طرح کی سوچ پیدا اب ہی ہو رہی ہے . نا جانے آگے اور کیا ترقی ہوگی  اور نئی باتوں کا پتا چلے گا .

ہم حیاتی دنیا کے بارے میں کتنا کم جانتے ہیں ، کیا ہم کو اس بات کا احساس ہے ؟

مشہور فوٹوگرافر جول سارٹور کی قدرتی ماحول کے بچاؤ پر لاجواب تقریر .

نامور فوٹوگرافر ، Yann Arthus-Bertrand کی یہ شاندار فلم ہم کو سمجھاتی ہے کہ ہم کیا داؤ پر لگا رہے ہیں . پوری فلم یہاں دیکھئے .

فزکس کی دنیا بھی ہم کو ہمارے ماحول کے بارے میں سکھاتی ہے . کبھی غور کیجئے ، چاہے واقعہ کیسا بھی ہو یا چیز کیسی بھی ہو ، وہ ایک probability wave کے ڈھنگ میں سوچا یا سوچی جا سکتی ہے . بہت ہی انوکھی بات ہے یے . کیونکہ انسان کا دماغ ایسا نہیں چلتا . وہ اس بات کو ماننے سے انکار کرتا ہے کہ بھلا کوئی چیز ایک ہی پل میں ، ایک سے زائد مقام پر بھی پائی جا سکتی ہے . لیکن یے علمی تجربوں سے ممکن پایا گیا ہے (جیسا کہ Wheeler’s Experiment) اور دانشوروں میں اس بات کو لے کر اب بھی بحث ہوتے رہتی ہے . اور ہان ، علمی تجربوں سے یے بھی ثابت ہوا ہے کہ دو علیحدہ چیزیں ، چاہے ان کے بیچ میں کتنا بھی فاصلہ ہو ، کبھی کبھی ان میں ایک قسم کا رابطہ ہوتا ہے ، جس کو quantum entanglement کہتے ہیں . ذہن ماننے کو انکار کرتا ہے ، لیکن ہاں یہ سچ ہے . اور بھی ایسی کئی دلچسپ باتیں ہیں جیسے multiple-space-dimensions , time dilation, wormholes وغیرہ . اور تو اور ، ان چیزوں کا جائزہ ہم گھر بیٹھے ہی لے سکتے ہیں . کبھی اندھیری رات کو ، اپنی نظریں آسمان کے ستاروں کی طرف دوڑ ایں اور غور کریں کہ ان کی روشنی کو ہماری آنکھوں تک پہنچنے میں کتنا وقت لگا ہوگا . کیا وہ جو ستارے آپ کو نظر آ رہے ہیں ، اتنی مدّت میں وہیں کے وہیں ہیں یا پھر چل بسے ہیں ؟ نظر دوڑانا شاید آپ کو مشکل کام لگتا ہوگا . لیکن Orion Nebula جیسی دور کی چیزیں تو آپ کے سامنے ہی ہیں ! ذرا دیکھئے تو !

ہم طبیعی کائنات کے بارے میں کتنا کم جانتے ہیں ، کیا ہم کو اس بات کا احساس ہے ؟

The Elegant Universe - PBS NOVA

PBS NOVA سے جاری کی گئی فزکس پر بہترین فلم

حساب کی دنیا میں ہم کو حال ہی میں پتا چلا ہے کہ infinity کے بھی اقسام ہوتے ہیں . بلکہ infinity کے infinite اقسام ہیں ! ایک infinity دوسری infinity سے بڑھی یا چوٹی ہو سکتی ہے . غور کر یے دو circles A & B پر . ایک بڑھا ہے ، تو دوسرا چھوٹا . یعنی کہ ایک کا circumference دوسرے سے بڑھا ہے . لیکن کیا یہ سچ نہیں کہ ہر circumference کے اندر infinite sides ہوتے ہیں ؟ تو بڑھے circle میں جو infinite sides ہیں وہ چھوٹے circle کے infinite sides سے زیادہ ہوئے ؛ ہے نا ؟ کتنی دلچسپ بات ہے . اور ایسی نا جانے کئی ایسی چیزیں ہیں جن کا اندازہ ہم کو آج بھی نہیں ہے .

ہم حساب کے بارے میں کتنا کم جانتے ہیں ، کیا ہم کو اس بات کا احساس ہے ؟

The Story of Maths - BBC

BBC کی شاندار فلم ، The Story of Maths

Marcus du Sautoy بتاتے ہیں symmetry کی اہمیت

پرسوں میں نے ایک اور تقریر دیکھی جس میں خطیب نے یے نقطہ اٹھایا کہ ہر دو ہفتے ، ایک ایسے انسان کی موت ہوتی ہے جو اپنے ساتھ ساتھ اپنی زبان اور ادبیات لے کر اس دنیا سے چل بستا ہے . وہ اپنی زبان کا واحد اور آخری بول چال میں استعمال کرنے والا فرد ہوتا ہے اور اس کے جانے کے بعد اس کی نسل ، اس زبان سے ناتا ہمیشہ کے لئے کھو بیٹھتی ہے . اور اس نسل کے ساتھ ساتھ دنیا کے باقی سبھی لوگ بھی . صدیوں سے اکٹھا کی گئی حکمت یافتہ باتیں جو اس زبان میں بندھی پڑھی تھیں ، اب وہ گویا ہمیشہ کے لئے غیب ہو جاتی ہیں .

ہم بیٹھے بیٹھے صدیوں کا علم ہاتھوں سے گنوا رہے ہیں ، کیا ہم کو اس بات کا احساس ہے ؟

ہر دو ہفتے اس دنیا سے ایک زبان چل بستی ہے

سچ پوچھیں توعام طور پر اس سوال کا جواب نفی میں ہوتا ہے .

اور انسان ان چیزوں پر غور و فکر کرنے کے بجائے ایسی چیزوں پر توانائی اور وقت ضائع کرنے کو ہمیشہ تیّار رہتا ہے . جیسا کہ ایک دوسرے سے جھگڑنا یا جنگ لڑنا ، یا پھر غیر اخلاقی اقتصادی برتری کے نشے میں آ کر ایک دوسرے کو کچلنا یا ایک دوسرے کے سامنے ٹانگ اڑانا وغیرہ وغیرہ .

کیا یے دانشمند مخلوق کی صفت ہے ؟ کیا ہم ایسا برتاؤ کر کے اپنے ‘ اشرف المخلوقات ‘ والے کردار سے منہ نہیں موڈ رہے ہیں ؟ کبھی کبھی لگتا ہے کہ آخرت تک یہی ماجرا رہے گا . جب تک کہ ہم میں اپنے ترجیحات‌‍ٍ زندگی کو صحیح کرنے کا احساس نہیں ہوگا یہی حال رہے گا .

اس نقطے سے ذہن میں ایک اور ایک خیال آیا . نا جانے انسان کی عقل کا کتنا حصّہ ماضی کے تجربوں پر منحصر ہوتا ہے . یعنی کہ ذکاوت کی دین (output) ، ماضی کی لین (input) پر کتنی منحصر ہے ؟

اگر انسان اپنے ماضی میں ، اپنے گرد و نواح سے اور اپنی حیثیت و کیفیت سے ناواقف ہوتا تو کیا یے توقع سے بعید ہے کہ وہ چھوٹی موتی ، نا گوار چیزوں پر اپنا وقت ضائع کرتا ؟ اپنا اصلی کردار ادا کرنا بھول جاتا ؟ غور کیا جاے تو ہم یے مظہرartificial intelligence programming میں بھی پا سکتے ہیں . میرا قیاس ہے کہ کئی AI systems اسی طرح چلتے ہیں . ان میں ضرور ایسا code ہوتا ہوگا جس سے روبوٹ کو باہر کی دنیا کا احساس پانے میں مدد ملتی ہوگی . جیسے ہی اس کو باہر کے ماحول میں تبدیلی کا احساس ہوتا ہے ، وہ اپنا رویّہ بدل دیتا ہے . شاید ہم بھی اسی طرح ہی ہیں . بس ہمارے شعور و احساسات کو مزید جگانا ہوگا .

کبھی سوچا نہیں تھا کہ اتنا طویل فلسفیانہ مضمون لکھو نگا . لکھتے لکھتے اتنا وقت گزر گیا ! تو بس دوستو ، آج کے لئے اتنا ہی . ملتے ہیں اگلی بار . اس طرح کبھی کبھی ہمیں اس تیز رفتار زندگی سے وقت نکال کر اپنے کردار کو نبھانے کے بارے میں سوچنا ہوگا . کہ بھئی ، ہم ‘ اشرف المخلوقات ‘ خطاب کے واقعی حقدار بنتے ہیں یا نہیں ؟ اپنے رب اور اس کی کائنات کو سمجھتے ہیں یا نہیں ؟ اور کس طرح اپنا وقت گزارنا چاہتے ہیں .

جانے سے پہلے اسی موضوع پر دیکھئے ایک لطف بھرا انگریزی گیت :

… The sky calls to us,
If we do not destroy ourselves,
We will one day venture to the stars …

Copyright Firas MR. All rights reserved.

لیجئے میرا پہلا اردو زبان میں بلوگ پوسٹ

with 3 comments


اردو ہے جسکا نام، ہم ہی جانتے ہیں داغ، سارے جہاں میں دھوم، ہماری زباں کی ہے ~ داغ

(ایک ضروری بات: اس مضمون کو سہی روپ میں دیکھنے کے لئے آپ ناظرین کو یہ font ڈاونلوڈکرکے اپنے سسٹم پر ڈالنا ہوگا. یہ ایسی font ہے جو خاص کمپیوٹر سکرین پر باآسانی پڑھنے کے لئے بنائی گئی ہے.)

آداب دوستو،

امید ہے کہ آپ لوگوں کو میری جانب سے کافی عرصے سے کچھ نہ سننے پر زیادہ شکایات نہیں ہوگی. دراصل بات یہ ہے کہ ہمیشہ کی طرح پڑھائی اور دیگر تعلیمی دنیا سے متعلق چیزوں نے مجھے کافی مصروف رکھا ہے.

میری ہمیشہ سے یہ خواہش تھی کہ کسی دن میں اپنے اس بلوگ پر اردو زبان میں بھی لکھوں. کیونکہ یہ تو میری مادری زبان ہے ہی اور پتہ نہیں کب اور کیسے میرا اس خوبصورت زبان سے رابطہ کچھ ٹوٹنے سا لگا تھا. شاید اس کا قصور میری سائنسی دنیا کا ہے، جو آج کل کے زمانے میں، انگریزی زبان پر ہی زور دیتی ہے. اور اگر اخبارات اور خبروں کی بات کی جائے تو مجھے کبھی یہ نہیں محسوس ہوا کہ اردو دنیا میں کوئی خاص کر انوکھی جیسی چیز ہو. لیکن اب مجھے لگتا ہے کہ میری یہ سوچ کتنی معصوم تھی. پچھلے کچھ ہفتوں سے میرے سامنے کئی ایسی مضامین آے ہیں جو انتہائی دلچسپ ہیں اور جو انگریزی زبان کی دنیا میں شاید ہی دیکھنے کو ملیںگے. یوں سمجھئے کہ مجھے اس زبان سے واقف ہونے کا مزہ آخر اب ہی مل رہا ہے. اور میں اس کے لئے کافی شکرگزار محسوس کر رہا ہوں.

آج کے لئے میرے پاس کسی خاص عنوان پر لکھنے کا رجحان تو نہیں. بس اتنا بتانا چاہتا ہوں کہ انٹرنیٹ پر اردو میں لکھنے کے لئے بہت سارے مددگار سائٹس ہیں. چاہے وہ Linux, BSD, FOSS سے متعلق ہوں یا پھر Windows سے. ان میں سے کچھ جو مجھے بہترین لگے، یہ ہیں:

     

  • اگر آپ کو لگتا ہے کہ آپ کا اردو ذخیرہ الفاظ کمزور ہے، تو یہ سائٹ آپ کو مدد کرے گی: http://www.urduenglishdictionary.org
  • اگر آپ Windows پر ہوں، تو Google Transliteration IME Keyboard ضرور استعمال کریں. فی الحال یہ صرف Windows کے لیے ہی فراہم ہو رہا ہے : http://www.google.com/ime/transliteration
  • Urdu Fonts ڈاونلوڈ کرکے انکا استعمال Openoffice, Firefox, etc میں کریں. بعض Fonts صرف Windows کے لئے خاص پروگرام کی ہوتی ہیں اور یہ Linux, BSD, etc پر نہیں چلینگی. Windows کے لئے بہترین Fonts آپ کو یہاں سے ملیں گی: http://www.crulp.org . اگر آپ Debian جیسے Linux flavor پر ہیں تو apt-get کا استعمال کریں. CRULP وغیرہ کی جانب 3rd-party fonts کو اس ترکیب سے اپنے سسٹم پر ڈالیے: http://wiki.archlinux.org/index.php/Fonts . واضح رہے کہ جس طرح انگریزی میں الگ الگ Fonts الگ الگ مسائل کے پیش نظر کام آتی ہیں، اسی طرح اردو میں بھی مختلف Fonts ہوتی ہیں جو الگ الگ قلمی انداز میں لکھی جاتی ہیں جیسے نستعلیق، نسخ وغیرہ اور کہیں ایک قسم کی font مناصب ہوگی تو وہیں پر دوسری نامناصب. ان پر بڑھی ہی عمدہ مضامین یہاں ہیں: ، http://salpat.uchicago.edu/index.php/salpat/article/view/33/29 ، http://en.wikipedia.org/wiki/Islamic_calligraphy
  • Linux, BSD وغیرہ پر SCIM اور IBus جیسی سہولتیں ملیں گی. ان کے ذرے آپ transliteration keyboards کا استعمال کر سکتے ہیں: http://wiki.debian.org/I18n/ibus , http://beeznest.wordpress.com/2005/12/16/howto-install-japanese-input-on-debian-sarge-using-scim/ . اردو میں لکھنے کے لئے آپ کو m17 packages install کرنا پڑیگا. اور یے بھی مت بھولیے کہ آپ کو اردو زبان کی locales بھی سسٹم پر ڈالنی پڑےنگی. خاص طور پر جو UTF-8 والی ہوں.
  • Firefox کے لئے اردو لغت کو install کرنے کے لئے پہلے Nightly Tester Tools addon install  کیجئے اور پھر Urdu Dictionary addon install کریے.
  • Debian وغیرہ میں کچھ دیگر ترتیبات کے بعد ہی Firefox اردو الفاظ کو سہی ڈھنگ سے دکھاتا ہے. دراصل Debian میں Firefox, Pango font rendering engine کا استعمال بند ہوتا ہے جس کی وجہ سے اردو کے الفاظ ٹھیک نہیں نظر آتے. Pango کو واپس لانے کے لئے ترکیب یہاں ہے: http://ubuntu.sabza.org/2006/08/18/firefox-for-linux-urdu-font-rendering
  • Firefox اور Debian کو لیکر مجھے یے بھی مسلہ کا سامنا کرنا پڑا. ویسے اسکا حل مجھے ابھی تک تو نہیں ملا ہے.
  • Openoffice کے لئے اردو لغت یہاں ملے گی: http://extensions.services.openoffice.org/en/project/dict-ur . اسے اپنے سسٹم پر ڈالنے کے بعد آپ کو Tools>Options>Language Settings میں جا کر Enabled for complex text layout tick-mark کرنا ہوگا. Default زبان کی فہرست میں اردو تو نہیں ہے. تو یہاں پر ہندی ہی رہنے دیجئے. ہوتا یہ ہے کہ جب آپ اردو میں ٹائپ کرنا شروع کرتے ہیں، تو خودبخود Openoffice وثیقہ کی زبان اردو ہے سمجھ جاتا ہے اور اسکا اشارہ bottom toolbar میں کرتا ہے. میرے تجربے میں Debian میں ایسا نہیں ہوتا. آپ کو پہلے اردو میں تھوڑے الفاظ ٹائپ کرنا پڑتا ہے. پھر bottom toolbar کے ذریے زبان کی setting مقرّر کرنی پڑتی  ہے. اچھا، چونکہ ہندی default CTL language ہے، جب آپ اردو ٹائپ کرنے لگتے ہیں، تو ایک ہندی font خودبخود منتخب کی جاتی ہے. جیسے Mangal وغیرہ. تو اس بات کا دھیان رکھتے ہوئے اردو ٹائپ کرتے وقت، اپنی font نسخ، نستعلیق، وغیرہ میں تبدیل کرنا نہ بھولیں.
  •  

تو پھر بس آج کے لئے اتنا ہی. امید ہے کہ آپ ناظرین سے پھر ملاقات ہوگی. تب تک کے لئے الوداع!


Copyright Firas MR. All Rights Reserved.

, , ,

Powered by ScribeFire.

Written by Firas MR

October 10, 2010 at 8:25 am

The Doctor’s Apparent Ineptitude

leave a comment »

ineptitude

via Steve Kay@Flickr (by-nc-nd license)

As a fun project, I’ve decided to frame this post as an abstract.

AIMS/OBJECTIVES:

To elucidate factors influencing perceived incompetence on the part of the doctor by the layman/patient/patient’s caregiver.

MATERIALS & METHODS:

Arm-chair pontification and a little gedankenexperiment based on prior experience with patients as a medical trainee.

RESULTS:

Preliminary analyses indicate widespread suspicions among patients on the ineptitude of doctors no matter what the level of training. This is amply demonstrated in the following figure:

As one can see, perceived ineptitude forms a wide spectrum – from most severe (med student) to least severe (attending). The underlying perceptions of incompetence do not seem to abate at any level however, and eyewitness testimonies include phrases such as ‘all doctors are inept; some more so than others’. At the med student level, exhausted patients find their anxious questions being greeted with a variety of responses ranging from the dumb ‘I don’t know’, to the dumber ‘well, I’m not the attending’, to the dumbest ‘uhh…mmmm..hmmm <eyes glazed over, pupils dilated>’. Escape routes will be meticulously planned in advance both by patients and more importantly by med students to avert catastrophe.

As for more senior medics such as attendings, evasion seems to be just a matter of hiding behind statistics. A gedankenexperiment was conducted to demonstrate this. The settings were two patients A and B, undergoing a certain surgical procedure and their respective caregivers, C-A and C-B.

Patient A

Consent & Pre-op

C-A: (anxious), Hey doc, ya think he’s gonna make it?

Doc: It’s difficult to say and I don’t know that at the moment. There are studies indicating that 95% live and 5% die during the procedure though.

C-A: ohhh kay (slightly confused) (murmuring)…’All this stuff about knowing medicine. What does he know? One simple question and he gives me this? What the heck has this guy spent all these years studying for?!’

Post-op & Recovery

C-A: Ah, I just heard! He made it! Thank you doctor!

Doc: You’re welcome (smug, god-complex)! See, I told ya 95% live. There was no reason for you to worry!

C-A: (sarcastic murmur) ‘Yeah, right. Let him go through the pain of not knowing and he’ll see. Look at him, so full of himself – as if he did something special; luck was on our side anyway. Heights of incompetence!’

Patient B

Consent & Pre-op

C-B: (anxious) Hey doc, ya think he’s gonna make it?

Doc: It’s difficult to say and I don’t know that at the moment. There are studies indicating that 95% live and 5% die during the procedure though.

C-B: ohhh kay (slightly confused) (murmuring)…’All this stuff about knowing medicine. What does he know? One simple question and he gives me this? What the heck has this guy spent all these years studying for?!’

Post-op & Recovery

C-B: (angry, shouting numerous explicatives) What?! He died on the table?!

Doc: Well, I did mention that there was a 5% death rate.

C-B: (angry, shouting numerous explicatives).. You (more explicatives) incompetent quack! (murmuring) “How convenient! A lawsuit should fix him for good!”

The Doctor’s Coping Strategy

Although numerous psychology models can be applied to understand physician behavior, the Freudian model reveals some interesting material. Common defense strategies that help doctors include:

Isolation of affect: eg. Resident tells Fellow, “you know that patient with the …well, she had a massive MI and went into VFib..died despite ACLS..poor soul…so hey, I hear they’re serving pizza today at the conference…(the conference about commercializing healthcare and increasing physician pay-grades for ‘a better  and healthier tomorrow’)”

Intellectualization: eg. Attending tells Fellow, “so you understand why that particular patient bled to death? Yeah it was DIC in the setting of septic shock….plus he had a prior MI with an Ejection Fraction of 33% so there was that component as well..but we couldn’t really figure out why the antibiotics didn’t work as expected…ID gave clearance….(ad infinitum)…so let’s present this at our M&M conference this week..”

Displacement: eg. Caregiver yells at Fellow, “<explicatives>”. Fellow yells at intern, “You knew that this was a case that I had a special interest in and yet you didn’t bother to page me? Unacceptable!…” Intern then yells at med student, “Go <explicatives> disimpact Mr. X’s bowels…if I don’t see that done within the next 15 minutes, you’re in for a class! Go go go…clock’s ticking…tck tck tck!”

We believe there are other coping mechanisms that are important too, but in our observations these appear to be the most common. Of the uncommon ones, we think med students as a group in particular, are the most vulnerable to Regression & Dissociation, duly accounting for confounding factors.

All of these form a systematic ego-syntonic pattern of behavior, but for reasons we are still exploring, is not included in the DSM-IV manual’s section on Personality Disorders.

CONCLUSIONS:

Patients and their caregivers seem to think that ALL doctors are fundamentally inept, period. Ineptitude follows a wide spectrum however – ranging from the bizarre to the mundane. Further studies (including but not limited to arm-chair pontification) need to be carried out to corroborate these startling results and the factors that we have reported. Other studies need to elucidate remedial measures that can be employed to save the doctor-patient relationship.

NOTE: I wrote this piece as a reminder of how the doctor-patient relationship is experienced from the patient’s side. In our business-as-usual frenzy, we as medics often don’t think about these things. And these things often DO matter a LOT to our patients!

Copyright © Firas MR. All rights reserved.

The Todas of the Nilgiris


Caption:- En-route to the South Indian hill-station of Ooty, otherwise known as Ootacamund or Udagamandalam. Ooty is home to the ‘Toda tribe’ which is one of the few Indian tribes which still practice Polyandry. (Courtesy: Nada MR)

As with any other science, studying medicine too comes with some added perks. New insights into what otherwise seem ordinary things lead us to new perspectives. The chapter on Social Sciences & Medicine in Park’s Textbook of Preventive & Social Medicine (18th ed) points out that polyandry is still seen in India among the Todas of the Nilgiri Hills, the inhabitants of Jaunsar Bawar in Uttar Pradesh and the Nayars of the Malabar Coast.

Written by Firas MR

July 6, 2006 at 1:42 pm